शहरी घरों में जलवायु साक्षरता क्यों ज़रूरी है?

भारत की लगभग 35% आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है, और यह संख्या 2036 तक 40% को पार कर सकती है। जैसे-जैसे शहरों का विस्तार हो रहा है, घरों की ऊर्जा खपत, कचरा उत्पादन और संसाधनों का अत्यधिक उपयोग भी बढ़ रहा है। इस परिस्थिति में, घर-घर में जलवायु साक्षरता को बढ़ाना एक सामाजिक आवश्यकता बन चुका है।

जलवायु संकट में शहरी घरों की भूमिका:

भारत की कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में घरेलू स्तर पर ऊर्जा उपयोग (खाना बनाना, कूलिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स) का हिस्सा लगभग 8% है। कचरे के निपटारे की असंगठित प्रक्रिया और पानी की बर्बादी इस संकट को और गहरा कर रही है।

एक औसत शहरी भारतीय घर हर महीने लगभग:

  • 200–300 यूनिट बिजली खर्च करता है।
  • 150–200 लीटर पानी प्रतिदिन प्रति व्यक्ति की दर से उपयोग करता है।
  • 1.5–2 किलोग्राम प्लास्टिक कचरा पैदा करता है।

वैश्विक उदाहरण: स्वीडन का मॉडल

स्वीडन ने अपने नागरिकों को जलवायु साक्षर बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। वहाँ Household Climate Declarations लागू किए गए हैं, जहाँ परिवारों को हर साल अपने कार्बन फुटप्रिंट की रिपोर्ट देनी होती है। देश ने 99% घरेलू कचरे का पुनः उपयोग या पुनर्चक्रण करना शुरू कर दिया है।

भारत में क्या हो सकता है?

भारत के शहरी घरों में जलवायु साक्षरता को बढ़ाने के लिए यह ज़रूरी है कि हम सिर्फ बातें न करें, बल्कि व्यवहार में बदलाव लाएँ:

  1. घटाएँ (Reduce): सोच-समझकर उपभोग करें
  • ऊर्जा दक्ष उपकरणों का उपयोग (5-स्टार रेटिंग वाले फ्रिज, AC)
  • प्राकृतिक रोशनी और वेंटिलेशन का उपयोग
  • लोकल और सीज़नल उत्पादों को प्राथमिकता देना

उदाहरण: अगर कोई परिवार सिर्फ 1 घंटे AC का उपयोग घटा दे, तो वह साल भर में लगभग 200 किलोवॉट घंटे की बचत कर सकता है — जो कि लगभग 160 किलोग्राम CO₂ उत्सर्जन से बचाव है।

  1. पुनः उपयोग करें (Reuse): एक चीज़, कई उपयोग
  • कपड़े की थैलियों का उपयोग
  • पुराने बर्तनों या डिब्बों को स्टोरेज के रूप में उपयोग करना
  • पुराने कपड़ों से पोछा या थैली बनाना

Data Insight: भारत में हर साल लगभग 9.46 मिलियन टन कपड़ा कचरा पैदा होता है। Reuse से इसका 20–30% कम किया जा सकता है।

  1. पुनर्चक्रण (Recycle): कचरे को संसाधन में बदलें
  • घर में कचरे को गीले-सूखे में विभाजित करें
  • स्थानीय RWA को सूचित कर के रिसाइकलिंग पार्टनर जोड़ें
  • कंपोस्टिंग को अपनाएँ (खासतौर पर अपार्टमेंट सोसाइटीज़ में)

उदाहरण: एक 4 सदस्यीय परिवार सालाना लगभग 400 किलो जैविक कचरा उत्पन्न करता है। यदि यह कंपोस्ट किया जाए तो 250 किलो उर्वरक पैदा किया जा सकता है।

शहरी भारत को जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए सबसे पहले खुद को साक्षर बनाना होगा। जलवायु साक्षरता का अर्थ है — यह जानना कि हमारे छोटे-छोटे निर्णय पृथ्वी के भविष्य को कितना प्रभावित करते हैं।
इस बदलाव की शुरुआत घर से होती है, और यदि हर परिवार घटाना, पुनः उपयोग करना और पुनर्चक्रण को अपनाए, तो हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर और संतुलित वातावरण बना सकते हैं।

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